धनवान बनने के लिए ऐसे सपने देखना शुरू कीजिए

जीवन में कुछ सपने होना या देखना स्वाभाविक है, लेकिन जीवन में आने वाली समस्याओं, विशेष रूप से आर्थिक समस्याओं से घबराकर कुछ लोग अपने सपनों का गला घोंटने लगते हैं। वे अपने खर्चों में कटौती करने लगते हैं। उनके अनुसार जीवन में समस्याओं से बचने का यही एकमात्र उपाय है, लेकिन वास्तविकता इसके विपरीत होती है।

समस्याओं से बचने से न तो हमारी समस्याएं कम होती हैं और न उनका समाधान ही हो पाता है। लोग प्रायः कहते हैं कि ऐसे सपने देखने से क्या फायदा, लेकिन आज ये बात सिद्ध हो चुकी है कि जीवन में आगे बढ़ने या कुछ पाने के लिए ऐसे सपने देखना बहुत जरूरी है। हमारा भविष्य हमारे सपनों के अनुरूप ही आकार ग्रहण करता है। आज तक दुनिया में जितने लोग भी सफलता के ऊंचे पायदानों पर पहुंचे हैं वो अपने सपनों की बदौलत ही ऐसा कर पाए हैं। जो लोग किसी भी क्षेत्र में सबसे नीचे के पायदान पर हैं वे भी अपने कमजोर व विकृत सपनों के कारण ही वहां हैं।

‘रिच डैड पुअर डैड’ के लेखक रॉबर्ट टी. कियोसाकी कहते हैं कि हमें अपने खर्चों में कमी करने की बजाय अपनी आमदनी बढ़ानी चाहिए और अपने सपनों को सीमित करने की बजाय अपने साहस और विश्वास में वृद्धि करनी चाहिए। जिस किसी ने भी सही सपने चुनने और देखने की कला विकसित की है वही संसार में सबसे ऊपर पहुंच सका है। ऊपर पहुंचने का अर्थ केवल धन-दौलत कमाने तक सीमित नहीं है, अपितु जीवन के हर क्षेत्र में उन्नति व विकास से है।

अच्छा स्वास्थ्य तथा प्रभावशाली व्यक्तित्व पाने का सपना भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं होता। जो लोग जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में अपेक्षित ऊंचाइयों तक नहीं पहुंच पाते, जरूर उनके सपनों व उन्हें देखने के तरीकों में कोई कमी रही होगी। सपने देखना एक उत्कृष्ट कला है। प्रश्न उठता है कि सही सपनों का चुनाव कैसे करें और कैसे उन्हें साकार करें।

हमारे मन में निरंतर विचार उत्पन्न होते रहते हैं। ये विचार ही हमारे सपने होते हैं। कई बार हमें अपने इन सपनों की जानकारी भी नहीं होती। यदि कोई गलत विचार हमारा सपना बन जाता है तो वह हमें तबाह कर सकता है। अतः गफलत अथवा नींद में नहीं अपितु सोच-समझकर सपने देखना ही श्रेयस्कर है। अपने विचार, भाव या सपने को चित्र के रूप में देखना सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण व फलदायी होता है। सपने देखने की पूरी प्रक्रिया हमारे मस्तिष्क को अत्यंत सक्रिय व उद्वेलित कर देती है।

मस्तिष्क की कोशिकाएं हमारे सपने के अनुरूप अपेक्षित परिस्थितियों का निर्माण करने में जुट जाती हैं और तब तक न स्वयं चैन से बैठती हैं और न हमें ही चैन से बैठने देती हैं जब तक कि वह सपना पूरा नहीं हो जाता। अतः ऊंचे सपने देखो। अच्छे सपने देखो। इसी में निहित है हर प्रकार की सफलता व उन्नति।

Jay Yogi Raj

भारत के सबसे बड़े राज्य उतरप्रदेश के नेता बननेपे हार्दिक बधाई माननीय योगीजी | एक कदम सुराज्य हिन्दुराष्ट्र की ओर |
जय श्री राम |
जय हिन्दू राष्ट्र |

कहीं ऐसा कर आप खाई में तो नहीं गिर रहें

ओशो कहते हैं कि सभी चीजों में एहतियात बरतें। केवल तभी आप जो बोलते हैं और जो सोचते हैं, उसके गुरु बन सकते हैं।

मनुष्य को चार हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। सबसे बाहरी हिस्सा या परिधि कर्म है अर्थात् आप क्या करते हैं। दूसरा हिस्सा कर्म से भी अधिक गहरा है और वह है कि आप क्या कहते हैं। इससे थोड़ी और अधिक गहरी आपकी सोच है, यानि आप क्या सोचते हैं और यह तीसरी परिधि है। चौथा भाग कोई परिधि नहीं है। चौथा हिस्सा आपकी वास्तविकता है यानि आपका अस्तित्व। वह चौथा हिस्सा आपका केंद्र है और आपका यह केंद्र आपके कर्म, कथन और विचार इन तीन परतों या परिधियों से घिरा है।

स्वयं का अनुसरण करें

क्या आप इस बात के प्रति सचेत हैं कि आप क्या कर रहे हैं? क्या आप इसे चेतना के साथ कर रहे हैं या सिर्फ इसलिये कर रहे हैं क्योंकि कोई दूसरा भी इसे कर रहा है? क्या आप एक भेड़ की तरह दूसरों का अनुसरण करते हैं? आपके लिए जरूरी है कि आप एक मनुष्य बनें ना कि कोई भेड़। भीड़ का अनुसरण ना करें बल्कि अपनी अलग पहचान रखें। केवल तभी आप एक गुरु बन सकते हैं। केवल खुद की पहचान बनाने वाला व्यक्ति ही एक गुरु बन सकता है। भीड़ में आप केवल एक दास हैं क्योंकि वो भीड़ ही गुलामों से बनी है। भीड़ आपको एक गुलाम ही बने रहने देना चाहती है। क्योंकि केवल तभी वो शक्तिशाली हो सकती है। सभी राजनेता और धार्मिक गुरु आपको एक दास की तरह ही देखना चाहते हैं क्योंकि तब ही वो धार्मिक गुरु और नेता महान बने रह सकते हैं।

अगर आप थोड़े सतर्क या जागरूक होते हैं तो आप यह देखने में पूरी तरह समर्थ होंगे कि ये नेता और धर्मिक गुरु झूठे हैं और आपको इनका अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उनका अनुसरण करना खाईयों में गिरने के समान है। देखें कि आप क्या कर रहें हैं और क्यों कर रहे हैं। क्या यह करना अर्थपूर्ण या जरूरी है? आप अपने जीवन का कीमती समय जो इसे दे रहे हैं, क्या यह उसके लायक है? या आप इसे सिर्फ इसलिये कर रहे हैं क्योंकि आपको पता नहीं कि और क्या करना चाहिए? बिना कारण जाने कुछ करने से बेहतर है कि आप कुछ ना करें। बिना जानें कुछ ना करें बल्कि सोचें कि क्या करना चाहिए। कई बार आप बिना सोचे कुछ कह जाते हैं और आपको फिर बाद में उस बात के लिए परेशानी उठानी पड़ती है। कई बार आप कोई बेकार की बात कहना नहीं कहने का निर्णय लेते हैं लेकिन बाद में कुछ ना कहना आपके लिए समस्या बन जाती है। अगर आप इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि आप क्या कर रहे हैं तो दोनों प्रकार की स्थिति आपके लिए समस्याएं पैदा कर सकता है। ऐसे में आपकी स्थिति बिलकुल वैसी होगी जैसे नींद में चलने वाले एक व्यक्ति की होती है। इसलिये जीवन में एहतियात बरतें। आप क्या सोचते हैं और क्या करते हैं, इस चीज में खुद को दक्ष बनाएं। स्वतंत्र रहें। अगर आप ज्ञानी और जागरूक हैं तो स्वतंत्रता आपके जीवन में अपनी स्वेच्छा से आयेगी। आपके जीवन में स्वतंत्रता एक गुरु की छाया की तरह बनी रहेगी।

आप एक साधक हैं

बुद्ध की यह बात याद रखें कि कि आप एक खोजकर्ता या जिज्ञाशु हैं। आप अपना सच्चा घर तलाश रहे हैं लेकिन अब तक यह आपको मिला नहीं है। पिछले कई जन्मों से आप तलाश करते आ रहे हैं और इस जीवन में भी आप तलाश कर रहे हैं। क्या आपने इसे तलाश लिया है? आप अपना समय बर्बाद ना करें। रास्ते से भटके नहीं। अपनी पूरी ऊर्जा तलाश करने में लगाएं क्योंकि कोई नहीं जानता कि कल क्या होगा। जीवन की खुशी केवल इसी बात में है जब कोई किसी चीज के गुरु या ज्ञानी बन जाते हैं और यह खुशी तब असीमित हो जाती है जब कोई व्यक्ति अपनी सोच, अपने कर्म और अपने कथन में पूरी तरह दक्ष या ज्ञानी हो जाता है। बुद्ध कभी भी मन और शरीर को नहीं बांटते हैं। वह कहते हैं: दोनों में ज्ञानी बनें क्योंकि आप मनोदैहिक हैं। इसलिये आप अपने शरीर और मन के गुरु बनें और तभी आप जान पायेंगे कि आप कौन हैं। तभी आप जान पायेंगे कि शरीर और मन से परे आपका अस्तित्व है और आप अपनी शुद्ध चेतना को जान पायेंगे।

जानिये कैसा है आपका दिमाग

मन की पूरी अवधारणा इसके चार कार्यों पर आधारित होती है और वह है मानस, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों कार्य मन को समझ और चेतना प्रदान करते हैं। इसके अलावा मन हमेशा से कल्पना करने वाला, तर्कसंगत, भावुक और मनोवैज्ञानिक रहा है।

मस्तिष्क या मन के चार प्रकार

1. सक्रिय दिमाग: योग कहता है कि पहले प्रकार का मन ‘क्रियाशील’ है जबकि मनोवैज्ञानिक इसे सक्रिय मन कहते हैं। क्रियाशील मन सक्रिय और बहिर्मुखी होता है। एक गतिशील मन बड़ी मुश्किल से खुद को शांत या स्थिर रख पाता है। बच्चों का मन गतिशील होता है। उनका मन बंटा हुआ या अलग-अलग दिशाओं में सोचने वाला नहीं होता है। लेकिन भटका हुआ मन या हर समय बदलने वाला मन गतिशील या सक्रिय मन से अलग होता है। सक्रिय मन अगर एक विषय पर अपना ध्यान केंद्रित कर ले तो वो चेतनात्मक या अचेतनीय रूप से उसी का अनुसरण करता रहता है। वयस्कों में जब सक्रिय मन प्रबल होता है तो वह व्यक्ति बहिर्मुखी स्वभाव का होता है और परिवार, समाज और पेशेवर लोगों के साथ अधिक मिलनसार हो जाता है। ऐसे व्यक्ति हर उस काम में रूचि दिखाते हैं जो समाज और दूसरे लोगों को उसके करीब लाएगी। सक्रिय मस्तिष्क वाला व्यक्ति बहुत ही सामाजिक और व्यवहारिक होता है।

2. सचेत या तार्किक दिमाग: दूसरे प्रकार का दिमाग बुद्धिजीवी मन है जिसे मनोवैज्ञानिक बौद्धिक, तार्किक, सचेत, गणितज्ञ और वैज्ञानिक दिमाग भी कहते हैं। इस तरह का दिमाग ऐसे लोगों में प्रबल होता है जो खोज या जांच करते हैं, सिद्धांतो को जन्म देते हैं या सूत्रों को विकसित करते हैं। ऐसा दिमाग वैज्ञानिकों का होता है। दार्शनिकों और ज्ञानी लोगों का दिमाग भी बौद्धिक होता है। जब बुद्धिजीवियों के लिए बाहर के वातावरण से खुद को जोड़ना मुश्किल होता है। ऐसे लोग एकांत में रहना पसंद करते हैं। वो सोचना, विश्लेषण करना और समस्याओं का हल ढ़ूंढ़ना पसंद करते हैं।

3. भावुक मन: तीसरे प्रकार का मन भाविक मन होता है जिसमें भाव, भावनाएं, संवेदनाएं और मानसिक व्यवहार प्रबल होते हैं। ऐसे लोग काफी संवेदनशील होते हैं। वो दर्द और चोट का अनुभव आसानी से कर पाते हैं, लेकिन इस कारण वो दुख या निराशाजनक अवस्था में भी आसानी से चले जाते हैं। वो इतने भावुक होते हैं कि आसानी से जीवन की सच्चाईयों का सामना नहीं कर पाते। इस तरह के व्यक्तित्व वाले लोग कभी-कभी दिव्यता या किसी शक्ति से जोड़ने के लिए खुद को प्रेरित करते हैं। ऐसे लोग किसी संन्यासी, पादरी या नन का अनुसरण करते हैं और उनके भक्त कहलाते हैं। यह दुनिया ऐसे लोगों के लिए अतार्किक होती है और वो केवल खुद को किसी दिव्यता से ही तार्किक रूप से जोड़ पाते हैं। यह एक ऐसा जोड़ होता है जिसमें वो खुशी तलाश पाते हैं। अगर ऐसे लोग दुनिया से जुड़ते हैं तो उनका अनुभव काफी दर्दभरा होता है। वो दुनिया को एक विनाशकारी अनुभव के तौर पर देखते हैं जिसमें सिर्फ पीड़ा का वास है।

4. मनोवैज्ञानिक दिमाग: चौथे प्रकार का यह दिमाग अंर्तजागृतिमन या मनोवैज्ञानिक है। इस प्रकार के दिमाग में बाह्य वातावरण के बजाय आंतरिक प्रक्रिया में मन, मानस, बुद्धि, चित्त और अहंकार अधिक जागृत रहती हैं। वो लोग जो ऐसे दिमाग के साथ जन्में होते हैं, वो सामान्यत: योगी बन जाते हैं और खुद को उच्च रहस्यवादी और आध्यात्मिक अभ्यास में व्यस्त रखते हैं। आध्यात्मिकता उनके जीवन का आधार बन जाता है।

यौन ऊर्जा दिव्य होती हैं

ओशो इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि मनुष्य सेक्स के खिलाफ युद्ध क्यों करते हैं।

मनुष्य ने सेक्स के खिलाफ एक युद्ध शुरु किया है और इससे जुड़े परिणाम का सही आकलन करना मुश्किल है… वेश्यावृति समाज की सभ्यता में सीधे अनुपात में मौजूद है। क्या इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वेश्यावृति जैसी संस्था पहली बार अस्तित्व में कहां आई? क्या पहाड़ी इलाकों में बसने वाले जनजातीय लोगों के बीच वेश्यावृति अस्तित्व में है? यह असंभव है। क्योंकि सेक्स के लिए वेश्याओं की तस्करी का धंधा आधुनिक मानव सभ्यता में विकसित हुआ है। हम और भी चकित हो जायेंगे जब हम सेक्स से होने वाले बीमारियों की लिस्ट देखेंगे। इन सारी कुरूपताओं के लिए कौन जिम्मेदार है? इसके लिए वो लोग जिम्मेदार हैं जो लोगों को सेक्स की भावना को समझने की बजाय इसका दमन करना सिखाते हैं। इस दमन के कारण आदमियों की सेक्स की ऊर्जा गलत तरीके से बाहर आ रही है। पुरुषों का पूरा समाज बीमार और घिनौना है और अगर इस कैंसर रूपी समाज को बदलना है तो इस बात को स्वीकार करना जरूरी है कि सेक्स की ऊर्जा दिव्य होती हैं। सेक्स के लिए आकर्षण अनिवार्य रूप से धार्मिक है।

सेक्स का आकर्षण इतना शक्तिशाली क्यों है? यह तो निश्चित है कि यह शक्तिशाली है। अगर हम सेक्स की बुनियादी स्तरों को समझ जाते हैं तो किसी भी व्यक्ति को इससे बाहर ला सकते हैं। केवल तभी कर्म के संसार से राम का संसार उभरकर आ सकता है। केवल तभी जुनून की दुनिया से बाहर करुणा की दुनिया विकसित हो सकती है। दोस्तों के एक समूह के साथ मैं खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध मंदिर देखने गया। मंदिर का बाहरी दीवार और परिसर यौन क्रियाओं के दृश्यों और संभोग की कई मुद्राओं से सजा हुआ था। अलग-अलग सेक्स मुद्राओं को दर्शाती हुई कई मूर्तियां थी। मेरे एक दोस्त ने पूछा कि मंदिर को सजाने के लिए ये मूर्तियां यहां क्यों रखी हुई है। मैंने उन्हें बताया कि जिन शिल्पकारों ने इस मंदिर को बनाया है, वो काफी बुद्धिमान लोग थे। वो सेक्स के जुनून को जानते थे और यह भी कि यह जीवन की परिधि पर मौजूद है। उनका विश्वास था कि जो लोग अब तक सेक्स में जकड़े हुए हैं, उन्हें इस मंदिर में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं है।

हम अंदर गये। मंदिर के अंदर भगवान की कोई मूर्ति नहीं थी। मेरा दोस्त अंदर भगवान की कोई मूर्ति ना पाकर आश्चर्यचकित था। मैंने उन्हें बताया कि जीवन के बाहरी दीवार पर वासना और जुनून का अस्तित्व है जबकि भगवान का मंदिर अंदर है। वो लोग जो अभी भी जुनून या सेक्स से मुग्ध हैं, वो मंदिर के अंदर विराजित भगवान की मूर्ति तक नहीं पहुंच सकते हैं। वो केवल बाहरी दीवार तक ही घूमते रह जाते हैं। इस मंदिर को बनाने वाले लोग समझदार थे। यह एक ध्यान का केंद्र था जिसके सतह पर और चारों ओर कामुकता थी जबकि केंद्र में शांति और खामोशी का वास था। उन्होंने आकांक्षियों को यह बताने की कोशिश की थी कि सेक्स पर ध्यान कैसे करें। जब वो सेक्स को अच्छी तरह से समझ गये तो निश्चित तौर पर उनका मन इससे मुक्त हो गया था। वो फिर अंदर गये होंगे और भगवान की मूर्ति को देखा होगा।

लेकिन धर्म के नाम पर हम सेक्स को समझने की हर संभावना को नष्ट कर देते हैं। हमलोगों ने सेक्स के नाम पर अपनी ही बुनियादी सहज प्रवृति के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है। इसका मानक नियम सेक्स की ओर नहीं देखना है और अपनी आंखें बंद करके भगवान के मंदिर में जबरदस्ती घुसना है। लेकिन कोई अपनी आंखें बंद किये कहीं पहुंच सकता है क्या? अगर आप मंदिर के अंदर पहुंच भी जाते हैं तो बंद आंखों से भगवान को नहीं देख सकते हैं। इन दिनों इस धरती पर सेक्स का मुझसे बड़ा दुश्मन ढ़ूंढ़ना मुश्किल है। अगर लोग बिना पक्षपात किए मेरी बातों पर ध्यान दें तो संभव है कि वो कामुकता की भावना से मुक्त हो जाएं। बेहतर मानवता के लिए केवल यही एक पाठ्यक्रम है। हम मानते हैं कि पंडित सेक्स के दुश्मन हैं। वो इसके दुश्मन बिल्कुल नहीं हैं बल्कि वो इसके प्रचारक हैं। उन्होंने सेक्स को लेकर एक आकर्षण को जन्म दे दिया है। उनका सेक्स का विरोध करना लोगों को इसके प्रति और आकर्षित करता है और उन्हें इसके लिए पागल बनाता है।

खुश रहने का सूत्र

आप अपने सपनों और उच्च महत्त्वाकांक्षाओं को साकार करके अपनी तकदीर फिर से बना सकते हैं।
हर व्यक्ति को जीवन से मिले सबक और चुनौतियां भिन्न होती हैं, और हर व्यक्ति की कहानी के पीछे की कहानी उनकी अपनी है। हालांकि हम सबका सार्वभौमिक लक्ष्य यह जानना है कि हम सब में ईश्वर का अक्श है। इसका मतलब यह है कि हम में सब तरह के दुखों से निवृत्त होने की क्षमता है और हम अतिमानव (सुपरह्यूमन) स्तर की शांति, प्रेम, विवेक और खुशी प्राप्त कर सकते हैं। हम अपने ऊंचे सपनों और महत्वाकांक्षाओं को साकार करके अपनी तकदीर फिर से बना सकते हैं, पर इसके लिए इच्छाशक्ति का होना आवश्यक है। हममें केवल खुद की तकदीर बनाने की क्षमता ही नहीं है, बल्कि उनकी भी बना सकते हैं, जिनसे हम प्यार करते हैं-हमारा समुदाय, हमारा राष्ट्र, हमारी दुनिया। संक्षेप में कहें, तो हम ईश्वर हैं।
मैं ईश्वर!
यदि हम ईश्वर हैं, तो पृथ्वी पर हमारा जीवन निर्वाण जैसा क्यों नहीं है, जहां सबके पास जरूरत के साधन हैं, जहां सबके लिए न्याय और स्वतंत्रता है, और जहां हर व्यक्ति अपने ऊंचे सपनों को साकार करने में व्यस्त है, सबके साथ, आनंद के साथ? जवाब आसान है: हमने पृथ्वी पर निर्वाण की रचना नहीं की है क्योंकि आप, और इस पृथ्वी के अधिकांश लोग नहीं मानते कि ऐसा संभव है। क्योंकि आपके दिमाग में यह बात बैठी हुई है कि आप गलतियां करते हैं, कमजोर हैं और मरणशील हैं। इसी वजह से विवेकानंद ने कहा था, ‘ब्रह्मांड की सभी शक्तियां पहले से हमारी हैं। यह हम हैं, जिन्होंने अपने हाथों से अपनी आंखों को ढक रखा है और चिल्ला रहे हैं कि अंधेरा है।Ó दरअसल बात यह है कि यदि आप निश्चित तौर पर जानते हैं कि आप ईश्वर हैं और ऐसा बनने की आपमें शक्तियां हैं, तो आप इसी क्षण निर्वाण की स्थिति में होते, क्योंकि जो आप सोचते हैं, जैसा आप सोचते हैं-आपके भाव, विचार, मान्यताएं और उम्मीदें-वही आपको जिंदगी में मिलता है और उसी से आप अपनी तकदीर लिखते हैं।
जैसा सोचेंगे वैसा बनेंगे
अधिकांश लोगों की मान्यता के विपरीत, हमारे विचार केवल हमारे मन तक सीमित नहीं रहते। ये सूक्ष्म क्वांटम या सूक्ष्म ऊर्जा-इलैक्ट्रोमैज्नेटिक ऊर्जा-के फॉर्म में रहते हैं, जो हमारे शरीर में और बाहर दुनिया में असाधारण दूरियों तक सुपर-ल्यूमिनल गति से प्रवाहित होते हंै, तुरंत, बिना एक पल खोए। ऊर्जा सदैव अपने जैसी ऊर्जा को आकर्षित करती है: नकारात्मक विचार तनावपूर्ण घटनाओं और तकलीफदेह लोगों को आकर्षित करते हैं, जबकि अच्छे विचार प्यार, खुशी और सफलता को आकर्षित करते हैं। यह वैज्ञानिक तथ्य है, जो क्वांटम फिजिक्स और सूक्ष्म ऊर्जा मेडिसिन के क्षेत्र में शताब्दी से अधिक समय के शोध-कार्यों से प्रमाणित है। और हाल में जोंस हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की बे्रन इमेजिंग स्टडीज ने भी इसे माना है। इसीलिए बुद्ध ने कहा था, ‘मन सबकुछ है। आप जो सोचते हैं, बनते हैं। यूनानी दार्शनिक सुकरात और उनके शिष्य प्लेटो दोनों इससे सहमत थे। उनका कथन था, ‘जैसा आप सोचेंगे, वैसा बनेंगे।
जो बात पांच हजार साल पहले प्राचीन ऋषि और ऋषिका जानते थे, उसे विज्ञान ने बिना किसी शक के प्रमाणित कर दिया है: पदार्थ ऊर्जा से निर्मित है और ऊर्जा विचारों से शासित है। आपके विचार, आपका भविष्य बना रहे हैं, जिसे आप समय बीतने के साथ-साथ अनुभव कर रहे हैं। आप क्या हैं, और आप क्या कर सकते हैं, इसके बारे में संकीर्ण विचार मामूली भविष्य बनाएगा और कष्टों का अंबार लगा देगा। जीवन से बड़ी सोच..यानि ऊंचे विचार, जो यथार्थता की परिधि में हैं, आपकी ऊंची महत्वाकांक्षाओं के अनुकूल आपकी तकदीर बनाएंगे।
एक साधारण तथ्य कि पदार्थ ऊर्जा से निर्मित है और ऊर्जा विचारों से शासित है-कर्मों का संचालन करता है। अपनी सोच पर अधिकार करें, और आप अपने कर्म पर नियंत्रण करने में सक्षम हो जाएंगे। इसी  दिशा में सोचें, आप अपनी सर्वोच्च उम्मीदों और सपनों को एक नए अवतार…कष्टों से मुक्ति के लिए साकार कर सकेंगे। यह सच में सहज है। हालांकि मनाव मन उतना सरल नहीं है। यह जटिल मशीन है, जिसमें आपके विचार, भावनाएं, मान्यताएं और उम्मीदें काफी मात्रा में अवचेतन मन में चलती रहती हैं, जहां आप बिना सही साधन के नहीं पहुंच सकते हैं।
सकारात्मक सोच
कुछ सालों पहले एक किताब- ‘द सीक्रेटÓ विश्वभर में बेस्टसेलर रही। यह किताब इसी वैज्ञानिक आधारवाक्य पर है- पदार्थ ऊर्जा से निर्मित है और ऊर्जा विचारों से शासित है। किताब का दावा था कि आप जो चाहते हैं उसे प्राप्त कर सकते हैं, केवल उसके बारे सोचकर या कल्पना करके कि वह आपके पास पहले से है। हालांकि किताब ने पाठकों को काफी निराश किया था, जिन्होंने अपना सबकुछ अपनी इच्छित वस्तुओं-सेहत, संपत्ति, प्यार और इसी तरह की चीजों को पाने के लिए ऐसी ‘सकारात्मक सोचÓ में लगाया, लेकिन कोई परिणाम नहीं मिला। यदि इस किताब का आधारवाक्य सही है, और मैं विश्वास दिलाता हूं कि है, तो इन पाठकों ने ऐसा क्यों पाया कि केवल सकारात्मक सोच से इच्छित परिणाम नहीं मिल सकते? जवाब आसान है: मन की जिस अवस्था-चेतनावस्था-को वे काम में ले रहे थे, वह सबसे कमजोर, मन का सबसे छोटा हिस्सा थी। यदि आप कष्टों से मुक्ति चाहते हैं, सपने साकार करना चाहते हैं, तो आपको मन की हर अवस्था तक पहुंच करनी होगी और सोच को वहां तक ले जाना होगा।
अधिकांश लोग केवल चेतन मन के बारे में सजग रहते हैं-उसके रोजमर्रा के विचार, भाव, मान्यताएं और प्रवृत्तियां-लेकिन मन की और अवस्थाएंं भी हैं, जो उससे काफी सशक्त हैं, जिस स्तर पर आप लगातार सोचते रहते हैं, लेकिन आपको मालूम नहीं रहता है। चेतन मन के पीछे अचेतन मन छिपा रहता है और आप उसे काफी जीते हैं। फिर है उच्च चेतना की विशालता, जिसे लोग सामान्यतया ‘आत्माÓ कहते हैं। हर व्यक्ति को इस उच्च चेतना की जानकारी होती है और इसकी शक्ति अनंत है।
आप अपनी कुछ कहानी अपनी  सर्वोच्च महत्वाकांक्षाओं  के रूप में जीते हैं-इसकी ‘जानकारीÓ कि आप यहां क्यों हैं और जो पवित्र है, उसे पाने की ललक रहती है।
हम सबमें मन की अवचेतन और उच्च चेतन की अवस्था में ज्ञान और ऊर्जा का अंतहीन भंडार है, जिसमें तन-मन को स्वस्थ रखने, रोजमर्रा की चुनौतियों को जीतने और पूर्ण संतुष्टि और आनंद के साथ असाधारण जीवन को जारी रखने की योज्यता होती है। आपको अपने मन के इन छिपे आयामों के संपर्क में रहना चाहिए।
सफलता के तीन सूत्र
अपनी कहानी के पीछे की कहानी, कष्टों से मुक्त जिंदगी जीने की क्षमता के लिए तीन बातें आवश्यक हैं।
सही नजरिया: आप सपने लेने का साहस करें। आप रोमांचक जीवन जीने के मकसद से मनुष्य शरीर में जन्मे ईश्वर हैं। वो जिंदगी, जो पूर्ण संतोष, तालमेल, प्यार और खुशियों से भरपूर है।
स्वतंत्रता पाएं: आप कौन हैं, क्या कर सकते हैं, और कैसे अपनी और दूसरों की जिंदगी बेहतर हो सकती है, के बारे में जिन बातों ने आपकी मान्यताओं और उम्मीदों को विकृत किया है, ये विकृत अनुकूलित आदतें आपके कर्म को गाइड करती हैं। इससे आप कष्टों के लिए अतिसंवेदनशील बने रहते हैं और आप अपनी अंतहीन संभावनाओं को नहीं पहचान पाते हैं। इनसे मुक्ति पाना जरूरी है।
अपनी शक्ति का दावा: आप अपने मन की उच्च चेतना की अवस्था तक अपनी पहुंच बनाएं, जहां आप अपनी सर्वोत्तम तकदीर को समझ सकेंगे, और वह शक्ति जो इसे बनाने के लिए आवश्यक है। इस शक्ति से आप किसी भी उच्च आकांक्षा तक पहुंच सकते हैं और रास्ते में आने वाले कष्टों सहित सभी अवरोधों पर जीत हासिल कर सकते हैं।

आत्म अकेला विद्यमान रहता है

एक कुशल शिक्षक की अवधारणा उपनिषदीय बातचीत के हृदय में स्थित होती है जिसमें गुरु अपने शिष्यों की शंकाओं को स्पष्ट करते हैं और चेतनता के विषय पर उनको गहराई से सोचने के लिए प्रेरित करते हैं। चूंकि अनुभव एकमात्र असली कसौटी होता है, प्राचीन लोगों ने पहले गुरु की विकसित स्थिति पर ध्यान केंद्रित किया, जो दूसरों को एक उच्चतर चेतनता के प्रति जागरूक कर सकते हैं। यह केंद्रण अष्टावक्र संहिता की विशेषता बताता है, उपदेश- बातचीत आत्म-प्रत्यक्षीकरण पर केंद्रित है, जिसमें युवा संत अष्टावक्र और मिथिला के बुजुर्ग राजा, जनक के बीच, जिन्होंने खुद की अनंतता की चिर-चेतनता होने के रूप में ज्ञान की चर्चा की और उसे बंधन और मुक्ति क्या निर्मित करता है, के प्रश्न से जटिल रूप से जुड़ा समझते हैं।
“बोध-वस्तुओं के लिए अलगाव मुक्ति है : बोध-वस्तुओं के लिए प्रेम बंधन है।” अष्टावक्र ज्ञान की प्रकृति का वर्णन इस प्रकार करते हैं, सीधे केंद्रीय एकाग्रता की ओर जाना कि आत्म अकेला विद्यमान रहता है और बाकी सभी चीजें, मस्तिष्क बोध सांचे के भीतर, झूठी और अवास्तविक होती हैं। वे अपने शिष्यों का ध्यान अपनी खुद की बेचैनी की ओर आकर्षित करते हैं, एक संतुष्ट राजा होने के बावजूद अष्टावक्र सभी वस्तुओं से परे, सभी इच्छाओं से परे अपनी सच्ची प्रकृति के लिए मस्तिष्क की अनंत लालसा की बात करते हैं। साधक ने इस बेचैनी को शांत करने के लिए अब तक इस लोक में केवल तल्लीनता प्राप्त की है, उसकी पूर्ण समझ नहीं जिसकी वह तलाश करता है।
इस भौतिक तल्लीनता के परिणामस्वरूप साधक अतृप्त बना रहता है क्योंकि व्यक्ति वास्तव में केवल अपनी असली प्रकृति के बोध में संतुष्ट अनुभव कर सकता है। अष्टावक्र सभी रूपों में इच्छा का त्याग करने के लिए, चाहे वह आनंद या शिक्षण की इच्छा हो या पवित्र कार्यों की, जनक को प्रोत्साहित करने द्वारा विश्व की मायावी प्रकृति की अपनी व्याख्या को जारी रखते हैं, क्योंकि “बंधन केवल इच्छाओं से युक्त होते हैं और इच्छाओं का विनाश मुक्ति है”। वे उनको सभी चीजों की भंगुर प्रकृति से सतर्क रहने, चारों ओर हानि और पीड़ा देख कर विरक्ति निर्मित करने, यह समझने के लिए कहते हैं कि पीड़ा के इस चक्र की जड़ इच्छा के जन्म से लगाव है।
अष्टावक्र संहिता इस तरह बंधन-मुक्ति परिप्रेक्ष्य के ढांचे के भीतर पारिभाषित पूर्णतः आत्मानुभूति की प्रकृति पर केंद्रित करता है, जिसे व्यक्ति उसके मूल के इस पर्यवेक्षण में देख सकता है जो बाद में गोपद और शंकर द्वारा विचारों के अजातवाद या अद्वैत विद्यालय के रूप में औपचारिक हुआ था। अष्टावक्र मस्तिष्क के भीतर आत्म की पहचान के झूठे बोध को मिटाने पर जाते हैं, कहते हैं कि “यह बंधन है जब मस्तिष्क किसी चीज की इच्छा या शोक करता है, किसी चीज को इनकार या स्वीकार करता है, किसी चीज पर खुश या क्रोधित होता है।”
वह एक मुक्त और निडर आत्मा का सार उस व्यक्ति के रूप में प्रस्तुत करते हैं जिसने इच्छाओं का त्याग कर दिया है, क्योंकि “केवल इच्छा का त्याग दुनिया का त्याग होता है।” अष्टावक्र फिर आत्म के सुख की स्थिति के वर्णन का प्रयास करते हैं, जिसमें बहुलता की सभी धारणाएं दूर हो जाती हैं, जिसमें बौद्धिक या सौंदर्यबोधक या नैतिक अनुगमन भी द्वितीयक प्रतीत होते हैं, जहां “स्वर्ग या नरक या मुक्ति कुछ नहीं बल्कि इस विस्तारित लौकिक चेतनता में केवल आत्म होता है”। गुरु द्वारा जलाई गई ज्ञान की ज्वाला शिष्य की इच्छाओं को जला देती है और अंतिम दो अध्याय शिष्य के खुद के अनुभवजन्य बोध का उल्लेख करते हैं।

अलविदा अहंकार

विजय कुमार अहंकार के खिलाफ आपको चेतावनी देते हैं और वह कहते हैं कि- “अपने आप में कम आसक्त हो।”

 

एक प्याज के बारे में सोचिये, अगर आप उसे छीलते हैं, तो आपको एक के बाद एक परत प्राप्त होती है, क्योंकि उसके अंदर कोई गूदा नहीं होता हैं। उस स्थान पर मेरे या किसी और में इस तरह का कोई भी गुण नहीं है। जिस पर हम अपने आप पर गर्व महसूस करते हैं, अर्थात् जिसे हम अहंकार से संबंधित मानते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने काम, सफलता, परिवार या प्रसिद्धि से संबंधित अहंकार होता है। अहंकार एक व्यक्ति या दूसरे व्यक्तियों के बीच अंतर पैदा करता है। प्रत्येक व्यक्ति नाम और पहचान के बिना पैदा होता है। वह भूल जाता है कि- वह ईश्वर और ब्राहमण काएक मूल तत्व है।

 

अहंकार के दो मुख्य कारण ज्ञान और धन हैं। “लेकिन कोई भी व्यक्ति यदि ये दोनों तत्व होते हुए भी, आध्यात्मिक व्यवहार जैसे- धार्मिक पूजा, शास्त्रों का अध्ययन, तीर्थयात्राओं मे सम्मिलित होना और मंत्र का जाप या ध्यान करना जैसे कार्य करता है, तो उसमें अहंकार बहुत कम होता है।“ संतों के पास इस अहंकार का केवल एक अंश होता है,क्योंकि वें उनकी “मैं या स्वयं की भावना” से मुक्त हो चुके हैं। और अब  उनके पास केवल ‘आध्यात्मिक भावना या भव या शुद्ध अहम’ है, जोकि उन्हें अपने  आध्यात्मिक अनुभव, कि- ‘मैं आत्मा हूँ’ की एक भावना से प्राप्त हुआ है।

 

हम अपने भौतिक शरीर, भावनाओं और धारणाओं के साथ पहचाने जाते है। जो हमारे अवचेतन मन में विभिन्न विचारों या संस्कारों जैसे- तेज-मिज़ाज़ व्यक्तित्व, इच्छाएं,पसंद और नापसंद के कर्ण होते हैं, जहाँ जीवन का एकमात्र उद्देश्य “सांसारिक खुशी” प्राप्त करना होता है।

 

अहंकार से हानि और क्रोध

 

विचारों और भावनाओं के अनुसार- हमारा अहंकार क्रोध, घृणा, किसी एक के अपने कौशल में विश्वास का नेतृत्व कर सकता है और अभिलाषायें, व्यक्तिगत खुशी को प्राप्त करने के लिए या दूसरों के लिए त्याग की भावना को विकसित करने के लिये लगातार प्रयास कर सकती हैं।

 

यदि आपमें अधिक अहंकार है, तो आपको अत्यधिक दुख और हानि का समाना करना पड़ता है। यदि एक गर्वित खूबसूरत औरत समय के साथ वृद्ध हो जाती है या बीमार हो जाती है और उसकी सुंदरता लगातार फीकी पड़ती जाती है, तो वह दुखी हो जाएगी। और इसी प्रकार अगर कोई अमीर आदमी, अपने धन और सत्ता के प्रति सचेत है और अचानक से वह ये सब खो देता है, तो वह भी इसके लिए दुखी होगा। कभी-कभी अहंकार की वजह से, मनोवैज्ञानिक दुख, शारीरिक कष्ट से भी ज्यादा दर्दनाक होता है।

 

दूसरी ओर, संतों का मानना है कि- “सब कुछ भगवान से संबंध रखता है और वे कुछ भी नहीं है।“ यही कारण है कि- “वे आनंद या परमानंद की स्थिति मे हैं।“ यह श्री दासबोध की बोली है: “यदि आप कहते हैं कि- आप कर्ता हैं, तो आप दुखी हो जायेंगे, लेकिन यदि आप कहते हैं कि- श्री राम कर्ता हैं, तो आप सफलता, प्रसिद्धि और वीरता प्राप्त करते हैं।“

 

‘मैं या स्वयं की भावना’ को नष्ट किए बिना, कोई भी एक सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि सैद्धांतिक ज्ञान का उपयोग किसी एक को बेहतर बनाने के लिए किया जाए तो, यह बहुत उपयोगी है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो यह ज्ञान अहंकार में बदल जाता है और बौद्धिक पथभ्रष्ट का नेतृत्व करता है।

 

केवल एक अहंकार को समाप्त करके ही, आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। जब तक एक व्यक्ति में- ‘मैं’, ‘मुझे’, ‘मेरी’ की भावना बानी रहती है, तब तक वह भगवान या ब्राह्मण को नहीं जान सकता है। “लेकिन हम अहंकार को नष्ट करने की प्रक्रिया को कैसे शुरू करते हैं?”

 

जागरुक बनने के साथ आरंभ करें और अपने दोषों को स्वीकार करके आगे बढ़ने की शुरुआत करो। अर्थात दूसरों के दोषों की ओर इशारा करना बंद करें।

 

लोगों के प्रति विनम्रता को अपनाओ और सभी चीजों का भगवान की रचना के रूप मे मान करो। सीखने और सुनने के दृष्टिकोण को विकसित करो। सीखने के कौशल में, कोई भी एक ‘मैं कुछ भी नहीं जनता हूँ’ के प्रति जागरूक हो जाता है और दूसरों को सुनने से, हम अपने धैर्य, प्यार,सम्मान, और सहनशीलता को बढ़ा सकते हैं क्योंकि ये हमारे अहंकार को कम करता है।  जब एक व्यक्ति सम्मान या प्रशंसा की उम्मीद या मांग करता हैं, तो यह केवल उसके अहंकार को बढ़ावा देती है। अपने आप से किसी एक के परिवार या किसी एक की खुशी या दुख के बारे में बात करना उस व्यक्ति के के प्रति लगाव को दर्शाता है। किसी एक के बारे में केवल बात ना करने से ही, उसके प्रति लगाव को अपने आप से ही समाप्त किया जा सकता है। यह उपाय अहंकार को कम करता है। आप देखो कि- “आप स्थितियों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया करतें हैं।”क्या आप बाद में उन पर पछताने की बातें करते हो? इसके बजाय आप प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करना और आत्मविश्लेषण करना सीखें।

 

स्वार्थ भी अहंकार का एक अन्य स्रोत है। या शारीरिक रूप में (मुझे दुख नहीं होना चाहिए), मौखिक रूप में (क्या वे जो मेरे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं, जानते हैं कि- मैं कौन हूँ?) या मनोवैज्ञानिक रूप में (मेरी इच्छाओं का पालन किया जाना चाहिए?)। अहंकार को कम करने के लिए, अपने भाषण में- ‘मैं’, मुझे ‘मेरा’ जैसे शब्दों का प्रयोग ना करें। केवाल अपने लिये ही नहीं दूसरों के लिये भी कार्य करें। बच्चों के साथ खेलें जो कि- “आपकी स्थिति को और आपके अहंकार को भूलने मे आपकी मदद करते हैं।“

 

प्रेम, धैर्य, सहिष्णुता 

 

साधना एक ऐसा प्रयास है जो- “प्रतिदिन अहंकार को नष्ट करती है और भगवान का एहसास कराती है।“ भगवान की सेवा या सतसेवा आप सभी के लिए इस भावना के साथ कि- “आप सभी भगवान के सेवक हैं”, के रूप में आप सभी के लिये भगवान के द्वारा दी हुई एक भेंट हैं।“

 

यदि एक व्यक्ति के पास यह आध्यात्मिक भावना है कि- “मेरे द्वारा की हुई सेवा से भगवान प्राप्त हो रहे हैं और मेरे सभी कार्य भगवान द्वारा प्रदान किये गए हैं।” तो वह अपने कार्यों के लिये अर्चना नहीं करेगा। जब नियमित शारीरिक कामकाज जैसे- कपड़े धोने और सफाई करने के कार्यों का सेवा के रूप में प्रदर्शन किया जाता है, तो वहाँ तेजी से अहंकार में कमी आती है, लेकिन नहीं आप इस तथ्य के लिए ऋण चाहते हैं! अपने शरीर, मन और धन का त्याग करो। एक वस्तु को त्यागना, आपकी प्रार्थना में आपकी मदद करता है। मानसिक रूप से भगवान के लिए अपने घर और सामान को अर्पण करें और स्वयं के बारे में एक देखभाल करने वाले के रूप में विचार करें।

 

आध्यात्मिक प्रेम या प्रीत बिना उम्मीद का प्यार है। इसलिए, दूसरों के बारे में भी सोचो, ना कि सिर्फ अपने बारे में। जब स्वयं के लिए प्यार कम हो जाता है, तो अहंकार कम हो जाता है। आध्यात्मिक प्यार पूर्ण रूप से ईश्वर के प्रेम और उनकी कृतियों, जिसमें परिवार बिना किसी उम्मीद के शामिल हैं। भगवान की कृपा से हम अपने अहंकार और अपने खुद के नाम के बारे में भूला जाते हैं। भगवान के नाम का जाप करने के बजाय, उसके नाम के साथ विलय हो जाओ। अहंकार के खिलाफ सचेत रहो और एक आध्यात्मिक भावना को मन में रखो और मुझसे भगवान उनके नाम का जाप करने से प्रभावित हो रहे हैं। दूसरा उपाय अपनी प्रार्थना को बदलना है, अपने आपको उन घटनाओं के प्रति सचेत होने के लिये कहो जो आपमें अहंकार को बढ़ाती है और आपसे उन घटनाओं के लिये अहंकार को कम करने के लिये कहा जाता है।

 

अपने आप से शाश्वत प्रश्न पूछने के लिये कहो कि- ‘मैं कौन हूँ?’जिसका जवाब आपके अंदर ही निहित है। अपने अंदर देखो और तब आप अपने पूरे दिल से कहोगे कि- “मैं कोई नहीं हूँ।”

हम में से प्रत्येक अंतर्मन में एक संत है

केरल की मूल निवासी सिस्टर अल्फोंसा को हाल ही में वेटिकन के द्वारा संत की उपाधि दी गई है। दरअसल, केवल संत की इस उपाधि ने उन्हें संत नहीं बनाया बल्कि वह पहले से ही संत महिला थी। इस उपाधि का अर्थ यह है कि अब ईसाई पूजा पाठ के तरीकों में वह सार्वजनिक रुप से अभिनंदित होंगी। सिस्टर अल्फोंसा की तरह, बहुत से ऐसे पवित्र लोग हैं जो चर्च के द्वारा मान्य नहीं हुए हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह लोग उनसे कम आदरणीय हैं।

 

संत अल्फोंसा का जीवन कष्ट भरा था लेकिन उन्होंने कभी इसकी शिकायत नहीं की। बचपन में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया और उनका पालन एक कठोर व हिंसक महिला रिश्तेदार ने किया। उन्होंने उनका पैर जला दिया जिस कारण जवान होने पर उनका रुप बिगड़ गया। उन्होंने कईं सारी बीमारियों को झेला और युवावस्था में मात्र 36 साल की उम्र में कष्टप्रद ट्यूमर की वजह से उनकी मौत हो गई। फिर भी वह अपने दुर्भाग्य से दुखी नहीं थी बल्कि वह जरुरतमंदो की सहायता करती थीं। यद्यपि वह ईसाई मान्यताओं के प्रति समर्पित थीं, फिर भी उनकी सच्ची मित्रता दूसरे धर्मों के कुलीन लोगों के साथ थी। दयनीय कष्ट में होने के बावजूद वह अपने आस-पास मौजूद पीड़ित लोगों में उपचारात्मक आशाएं उत्पन्न करती थीं।

 

एक प्रशिक्षार्थी साध्वी (एक प्रार्थक) के रुप में उन्होनें अपनी डायरी में लिखा, “मुझसे किसी का तिरस्कार कभी न हो इसके प्रति मैं सावधान रहना चाहती हूँ। मैं दूसरों से केवल मीठे वचन ही बोलूँगी। मेरे कष्ट कैसे भी हों, मैं कभी शिकायत नहीं करुँगीं।” ऐसी सुंदर भावनाएं मधुर जीवन के लिए आदर्श हैं।

 

ईसाई लोग विश्वास करते हैं कि मौत के बाद व्यक्ति की आत्मा जीवित रहती है, चाहें स्वर्ग (अच्छे व्यक्ति के लिए) में या नर्क (बुरे व्यक्ति के लिए) में। संतों की सूची में सम्मिलित करना पोप द्वारा मान्यता देना है कि अल्फोंसा स्वर्ग में रह रही हैं। करुणा और अच्छाई हर धर्म में सम्मानित हैं। संत समान व्यक्ति को ईश्वर और साथियों दोनों को सम्मान देकर अपने विश्वास का साक्षी बनना पड़ता है। इस बात को स्वीकार करते हुए कि प्रसन्नता ही सबका उद्देश्य है, वे लोगों को अपनी पसंद का जीवन जीने की अनुमति देते हैं। प्रेम समाज में नमक के समान है, जो जीवन में स्वाद बढ़ाता है।

 

एक साधारण व्यक्ति भी अपने जीवन में छोटे-छोटे चमत्कार कर सकता है। जब आप थके, बीमार या झुंझलाहट में होते हैं तब आप आसानी से यह भूल जाते हैं कि एक दूसरे को कितना प्रेम करते हैं। जब हम अच्छा महसूस नहीं करते हैं तब यह केवल प्राकृतिक कड़कड़ाहट व गड़गड़ाहट के अनुसार प्रतीत होता है। लेकिन वह केवल हमारी समस्याओं को बढ़ाता है क्योंकि अब हमारे पास पीड़ा है और एक दुखी परिवार।

 

उदाहरण के लिए, पड़ोस का परिवार लें। पिता का मान इसलिए है क्योंकि वह अपने खण्ड में आए किसी भी जाति या नस्ल के नवागंतुकों का स्वागत एक समान मुस्कुराहट के साथ करते है। अच्छी सलाह और मदद की पेशकश के साथ वह सबके अच्छे मित्र बन जाते हैं। दादी माँ ने सौम्यता, मुस्कुराहट और बिना किसी शिकायत के उम्र व्यतीत की है, इसलिए उन्होने संवेदना और ध्यान का संग्रह किया है। लोग उनकी मदद करके प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनकी निशक्तता उन्हें अप्रिय नहीं बनाती है।

 

उत्साह, प्रेम और दान आत्मा की औषधियां हैं, जो लोगों को प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहने के लिए तैयार करती हैं। यह सत्य है कि एक परिवार में धार्मिक समुदाय घृणा से एक दूसरे का गला पकड़ लेते हैं। यदि हम एक दूसरे को प्रेम करें तो हम एक दूसरे की हत्या या घायल नहीं कर सकते। हम दूसरों को ऐसा करने के लिए उकसा नहीं पाएंगे। यदि हम साधारण और सादी वस्तुओं में आनंद प्राप्त कर लेते हैं तो हम दूसरों के जीवन व मरण की शक्ति को पाने की खोज नहीं करेंगे। और न ही अपनी इच्छा से लोगों की भीड़ को संचालित करने की कामना करेंगे।

 

यदि हम दानशील हैं, तो हम इसके बदले में दान के पात्र भी हैं, लेकिन इससे भी अधिक यह हमारी आत्मा को समृद्ध करेगी। वह लोग जो अपना अधिकांश त्याग देते हैं, वे हमसे अधिक समृद्ध होते हैं। साधु समान लोग परिवारों और समुदायों को एक बंधन में बांधकर प्रतिदिन स्वयं उनकी मदद करते हैं। हम जिन छोटे साधुओं से मिलते हैं वे हमें अच्छे लगते हैं, ओर उनके प्रत्येक समूह का ऐसे ही गुणी लोगों में एक हिस्सा मौजूद रहता है।