हम में से प्रत्येक अंतर्मन में एक संत है

केरल की मूल निवासी सिस्टर अल्फोंसा को हाल ही में वेटिकन के द्वारा संत की उपाधि दी गई है। दरअसल, केवल संत की इस उपाधि ने उन्हें संत नहीं बनाया बल्कि वह पहले से ही संत महिला थी। इस उपाधि का अर्थ यह है कि अब ईसाई पूजा पाठ के तरीकों में वह सार्वजनिक रुप से अभिनंदित होंगी। सिस्टर अल्फोंसा की तरह, बहुत से ऐसे पवित्र लोग हैं जो चर्च के द्वारा मान्य नहीं हुए हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि वह लोग उनसे कम आदरणीय हैं।

 

संत अल्फोंसा का जीवन कष्ट भरा था लेकिन उन्होंने कभी इसकी शिकायत नहीं की। बचपन में ही उन्होंने अपनी माँ को खो दिया और उनका पालन एक कठोर व हिंसक महिला रिश्तेदार ने किया। उन्होंने उनका पैर जला दिया जिस कारण जवान होने पर उनका रुप बिगड़ गया। उन्होंने कईं सारी बीमारियों को झेला और युवावस्था में मात्र 36 साल की उम्र में कष्टप्रद ट्यूमर की वजह से उनकी मौत हो गई। फिर भी वह अपने दुर्भाग्य से दुखी नहीं थी बल्कि वह जरुरतमंदो की सहायता करती थीं। यद्यपि वह ईसाई मान्यताओं के प्रति समर्पित थीं, फिर भी उनकी सच्ची मित्रता दूसरे धर्मों के कुलीन लोगों के साथ थी। दयनीय कष्ट में होने के बावजूद वह अपने आस-पास मौजूद पीड़ित लोगों में उपचारात्मक आशाएं उत्पन्न करती थीं।

 

एक प्रशिक्षार्थी साध्वी (एक प्रार्थक) के रुप में उन्होनें अपनी डायरी में लिखा, “मुझसे किसी का तिरस्कार कभी न हो इसके प्रति मैं सावधान रहना चाहती हूँ। मैं दूसरों से केवल मीठे वचन ही बोलूँगी। मेरे कष्ट कैसे भी हों, मैं कभी शिकायत नहीं करुँगीं।” ऐसी सुंदर भावनाएं मधुर जीवन के लिए आदर्श हैं।

 

ईसाई लोग विश्वास करते हैं कि मौत के बाद व्यक्ति की आत्मा जीवित रहती है, चाहें स्वर्ग (अच्छे व्यक्ति के लिए) में या नर्क (बुरे व्यक्ति के लिए) में। संतों की सूची में सम्मिलित करना पोप द्वारा मान्यता देना है कि अल्फोंसा स्वर्ग में रह रही हैं। करुणा और अच्छाई हर धर्म में सम्मानित हैं। संत समान व्यक्ति को ईश्वर और साथियों दोनों को सम्मान देकर अपने विश्वास का साक्षी बनना पड़ता है। इस बात को स्वीकार करते हुए कि प्रसन्नता ही सबका उद्देश्य है, वे लोगों को अपनी पसंद का जीवन जीने की अनुमति देते हैं। प्रेम समाज में नमक के समान है, जो जीवन में स्वाद बढ़ाता है।

 

एक साधारण व्यक्ति भी अपने जीवन में छोटे-छोटे चमत्कार कर सकता है। जब आप थके, बीमार या झुंझलाहट में होते हैं तब आप आसानी से यह भूल जाते हैं कि एक दूसरे को कितना प्रेम करते हैं। जब हम अच्छा महसूस नहीं करते हैं तब यह केवल प्राकृतिक कड़कड़ाहट व गड़गड़ाहट के अनुसार प्रतीत होता है। लेकिन वह केवल हमारी समस्याओं को बढ़ाता है क्योंकि अब हमारे पास पीड़ा है और एक दुखी परिवार।

 

उदाहरण के लिए, पड़ोस का परिवार लें। पिता का मान इसलिए है क्योंकि वह अपने खण्ड में आए किसी भी जाति या नस्ल के नवागंतुकों का स्वागत एक समान मुस्कुराहट के साथ करते है। अच्छी सलाह और मदद की पेशकश के साथ वह सबके अच्छे मित्र बन जाते हैं। दादी माँ ने सौम्यता, मुस्कुराहट और बिना किसी शिकायत के उम्र व्यतीत की है, इसलिए उन्होने संवेदना और ध्यान का संग्रह किया है। लोग उनकी मदद करके प्रसन्न होते हैं क्योंकि उनकी निशक्तता उन्हें अप्रिय नहीं बनाती है।

 

उत्साह, प्रेम और दान आत्मा की औषधियां हैं, जो लोगों को प्रसन्नतापूर्वक एक साथ रहने के लिए तैयार करती हैं। यह सत्य है कि एक परिवार में धार्मिक समुदाय घृणा से एक दूसरे का गला पकड़ लेते हैं। यदि हम एक दूसरे को प्रेम करें तो हम एक दूसरे की हत्या या घायल नहीं कर सकते। हम दूसरों को ऐसा करने के लिए उकसा नहीं पाएंगे। यदि हम साधारण और सादी वस्तुओं में आनंद प्राप्त कर लेते हैं तो हम दूसरों के जीवन व मरण की शक्ति को पाने की खोज नहीं करेंगे। और न ही अपनी इच्छा से लोगों की भीड़ को संचालित करने की कामना करेंगे।

 

यदि हम दानशील हैं, तो हम इसके बदले में दान के पात्र भी हैं, लेकिन इससे भी अधिक यह हमारी आत्मा को समृद्ध करेगी। वह लोग जो अपना अधिकांश त्याग देते हैं, वे हमसे अधिक समृद्ध होते हैं। साधु समान लोग परिवारों और समुदायों को एक बंधन में बांधकर प्रतिदिन स्वयं उनकी मदद करते हैं। हम जिन छोटे साधुओं से मिलते हैं वे हमें अच्छे लगते हैं, ओर उनके प्रत्येक समूह का ऐसे ही गुणी लोगों में एक हिस्सा मौजूद रहता है।

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