यौन ऊर्जा दिव्य होती हैं

ओशो इस बात पर आश्चर्य व्यक्त करते हैं कि मनुष्य सेक्स के खिलाफ युद्ध क्यों करते हैं।

मनुष्य ने सेक्स के खिलाफ एक युद्ध शुरु किया है और इससे जुड़े परिणाम का सही आकलन करना मुश्किल है… वेश्यावृति समाज की सभ्यता में सीधे अनुपात में मौजूद है। क्या इस बात का पता लगाया जा सकता है कि वेश्यावृति जैसी संस्था पहली बार अस्तित्व में कहां आई? क्या पहाड़ी इलाकों में बसने वाले जनजातीय लोगों के बीच वेश्यावृति अस्तित्व में है? यह असंभव है। क्योंकि सेक्स के लिए वेश्याओं की तस्करी का धंधा आधुनिक मानव सभ्यता में विकसित हुआ है। हम और भी चकित हो जायेंगे जब हम सेक्स से होने वाले बीमारियों की लिस्ट देखेंगे। इन सारी कुरूपताओं के लिए कौन जिम्मेदार है? इसके लिए वो लोग जिम्मेदार हैं जो लोगों को सेक्स की भावना को समझने की बजाय इसका दमन करना सिखाते हैं। इस दमन के कारण आदमियों की सेक्स की ऊर्जा गलत तरीके से बाहर आ रही है। पुरुषों का पूरा समाज बीमार और घिनौना है और अगर इस कैंसर रूपी समाज को बदलना है तो इस बात को स्वीकार करना जरूरी है कि सेक्स की ऊर्जा दिव्य होती हैं। सेक्स के लिए आकर्षण अनिवार्य रूप से धार्मिक है।

सेक्स का आकर्षण इतना शक्तिशाली क्यों है? यह तो निश्चित है कि यह शक्तिशाली है। अगर हम सेक्स की बुनियादी स्तरों को समझ जाते हैं तो किसी भी व्यक्ति को इससे बाहर ला सकते हैं। केवल तभी कर्म के संसार से राम का संसार उभरकर आ सकता है। केवल तभी जुनून की दुनिया से बाहर करुणा की दुनिया विकसित हो सकती है। दोस्तों के एक समूह के साथ मैं खजुराहो के विश्व प्रसिद्ध मंदिर देखने गया। मंदिर का बाहरी दीवार और परिसर यौन क्रियाओं के दृश्यों और संभोग की कई मुद्राओं से सजा हुआ था। अलग-अलग सेक्स मुद्राओं को दर्शाती हुई कई मूर्तियां थी। मेरे एक दोस्त ने पूछा कि मंदिर को सजाने के लिए ये मूर्तियां यहां क्यों रखी हुई है। मैंने उन्हें बताया कि जिन शिल्पकारों ने इस मंदिर को बनाया है, वो काफी बुद्धिमान लोग थे। वो सेक्स के जुनून को जानते थे और यह भी कि यह जीवन की परिधि पर मौजूद है। उनका विश्वास था कि जो लोग अब तक सेक्स में जकड़े हुए हैं, उन्हें इस मंदिर में प्रवेश करने का कोई अधिकार नहीं है।

हम अंदर गये। मंदिर के अंदर भगवान की कोई मूर्ति नहीं थी। मेरा दोस्त अंदर भगवान की कोई मूर्ति ना पाकर आश्चर्यचकित था। मैंने उन्हें बताया कि जीवन के बाहरी दीवार पर वासना और जुनून का अस्तित्व है जबकि भगवान का मंदिर अंदर है। वो लोग जो अभी भी जुनून या सेक्स से मुग्ध हैं, वो मंदिर के अंदर विराजित भगवान की मूर्ति तक नहीं पहुंच सकते हैं। वो केवल बाहरी दीवार तक ही घूमते रह जाते हैं। इस मंदिर को बनाने वाले लोग समझदार थे। यह एक ध्यान का केंद्र था जिसके सतह पर और चारों ओर कामुकता थी जबकि केंद्र में शांति और खामोशी का वास था। उन्होंने आकांक्षियों को यह बताने की कोशिश की थी कि सेक्स पर ध्यान कैसे करें। जब वो सेक्स को अच्छी तरह से समझ गये तो निश्चित तौर पर उनका मन इससे मुक्त हो गया था। वो फिर अंदर गये होंगे और भगवान की मूर्ति को देखा होगा।

लेकिन धर्म के नाम पर हम सेक्स को समझने की हर संभावना को नष्ट कर देते हैं। हमलोगों ने सेक्स के नाम पर अपनी ही बुनियादी सहज प्रवृति के खिलाफ युद्ध की घोषणा कर दी है। इसका मानक नियम सेक्स की ओर नहीं देखना है और अपनी आंखें बंद करके भगवान के मंदिर में जबरदस्ती घुसना है। लेकिन कोई अपनी आंखें बंद किये कहीं पहुंच सकता है क्या? अगर आप मंदिर के अंदर पहुंच भी जाते हैं तो बंद आंखों से भगवान को नहीं देख सकते हैं। इन दिनों इस धरती पर सेक्स का मुझसे बड़ा दुश्मन ढ़ूंढ़ना मुश्किल है। अगर लोग बिना पक्षपात किए मेरी बातों पर ध्यान दें तो संभव है कि वो कामुकता की भावना से मुक्त हो जाएं। बेहतर मानवता के लिए केवल यही एक पाठ्यक्रम है। हम मानते हैं कि पंडित सेक्स के दुश्मन हैं। वो इसके दुश्मन बिल्कुल नहीं हैं बल्कि वो इसके प्रचारक हैं। उन्होंने सेक्स को लेकर एक आकर्षण को जन्म दे दिया है। उनका सेक्स का विरोध करना लोगों को इसके प्रति और आकर्षित करता है और उन्हें इसके लिए पागल बनाता है।

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