जानिये कैसा है आपका दिमाग

मन की पूरी अवधारणा इसके चार कार्यों पर आधारित होती है और वह है मानस, बुद्धि, चित्त और अहंकार। ये चारों कार्य मन को समझ और चेतना प्रदान करते हैं। इसके अलावा मन हमेशा से कल्पना करने वाला, तर्कसंगत, भावुक और मनोवैज्ञानिक रहा है।

मस्तिष्क या मन के चार प्रकार

1. सक्रिय दिमाग: योग कहता है कि पहले प्रकार का मन ‘क्रियाशील’ है जबकि मनोवैज्ञानिक इसे सक्रिय मन कहते हैं। क्रियाशील मन सक्रिय और बहिर्मुखी होता है। एक गतिशील मन बड़ी मुश्किल से खुद को शांत या स्थिर रख पाता है। बच्चों का मन गतिशील होता है। उनका मन बंटा हुआ या अलग-अलग दिशाओं में सोचने वाला नहीं होता है। लेकिन भटका हुआ मन या हर समय बदलने वाला मन गतिशील या सक्रिय मन से अलग होता है। सक्रिय मन अगर एक विषय पर अपना ध्यान केंद्रित कर ले तो वो चेतनात्मक या अचेतनीय रूप से उसी का अनुसरण करता रहता है। वयस्कों में जब सक्रिय मन प्रबल होता है तो वह व्यक्ति बहिर्मुखी स्वभाव का होता है और परिवार, समाज और पेशेवर लोगों के साथ अधिक मिलनसार हो जाता है। ऐसे व्यक्ति हर उस काम में रूचि दिखाते हैं जो समाज और दूसरे लोगों को उसके करीब लाएगी। सक्रिय मस्तिष्क वाला व्यक्ति बहुत ही सामाजिक और व्यवहारिक होता है।

2. सचेत या तार्किक दिमाग: दूसरे प्रकार का दिमाग बुद्धिजीवी मन है जिसे मनोवैज्ञानिक बौद्धिक, तार्किक, सचेत, गणितज्ञ और वैज्ञानिक दिमाग भी कहते हैं। इस तरह का दिमाग ऐसे लोगों में प्रबल होता है जो खोज या जांच करते हैं, सिद्धांतो को जन्म देते हैं या सूत्रों को विकसित करते हैं। ऐसा दिमाग वैज्ञानिकों का होता है। दार्शनिकों और ज्ञानी लोगों का दिमाग भी बौद्धिक होता है। जब बुद्धिजीवियों के लिए बाहर के वातावरण से खुद को जोड़ना मुश्किल होता है। ऐसे लोग एकांत में रहना पसंद करते हैं। वो सोचना, विश्लेषण करना और समस्याओं का हल ढ़ूंढ़ना पसंद करते हैं।

3. भावुक मन: तीसरे प्रकार का मन भाविक मन होता है जिसमें भाव, भावनाएं, संवेदनाएं और मानसिक व्यवहार प्रबल होते हैं। ऐसे लोग काफी संवेदनशील होते हैं। वो दर्द और चोट का अनुभव आसानी से कर पाते हैं, लेकिन इस कारण वो दुख या निराशाजनक अवस्था में भी आसानी से चले जाते हैं। वो इतने भावुक होते हैं कि आसानी से जीवन की सच्चाईयों का सामना नहीं कर पाते। इस तरह के व्यक्तित्व वाले लोग कभी-कभी दिव्यता या किसी शक्ति से जोड़ने के लिए खुद को प्रेरित करते हैं। ऐसे लोग किसी संन्यासी, पादरी या नन का अनुसरण करते हैं और उनके भक्त कहलाते हैं। यह दुनिया ऐसे लोगों के लिए अतार्किक होती है और वो केवल खुद को किसी दिव्यता से ही तार्किक रूप से जोड़ पाते हैं। यह एक ऐसा जोड़ होता है जिसमें वो खुशी तलाश पाते हैं। अगर ऐसे लोग दुनिया से जुड़ते हैं तो उनका अनुभव काफी दर्दभरा होता है। वो दुनिया को एक विनाशकारी अनुभव के तौर पर देखते हैं जिसमें सिर्फ पीड़ा का वास है।

4. मनोवैज्ञानिक दिमाग: चौथे प्रकार का यह दिमाग अंर्तजागृतिमन या मनोवैज्ञानिक है। इस प्रकार के दिमाग में बाह्य वातावरण के बजाय आंतरिक प्रक्रिया में मन, मानस, बुद्धि, चित्त और अहंकार अधिक जागृत रहती हैं। वो लोग जो ऐसे दिमाग के साथ जन्में होते हैं, वो सामान्यत: योगी बन जाते हैं और खुद को उच्च रहस्यवादी और आध्यात्मिक अभ्यास में व्यस्त रखते हैं। आध्यात्मिकता उनके जीवन का आधार बन जाता है।

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