कहीं ऐसा कर आप खाई में तो नहीं गिर रहें

ओशो कहते हैं कि सभी चीजों में एहतियात बरतें। केवल तभी आप जो बोलते हैं और जो सोचते हैं, उसके गुरु बन सकते हैं।

मनुष्य को चार हिस्सों में विभाजित किया जा सकता है। सबसे बाहरी हिस्सा या परिधि कर्म है अर्थात् आप क्या करते हैं। दूसरा हिस्सा कर्म से भी अधिक गहरा है और वह है कि आप क्या कहते हैं। इससे थोड़ी और अधिक गहरी आपकी सोच है, यानि आप क्या सोचते हैं और यह तीसरी परिधि है। चौथा भाग कोई परिधि नहीं है। चौथा हिस्सा आपकी वास्तविकता है यानि आपका अस्तित्व। वह चौथा हिस्सा आपका केंद्र है और आपका यह केंद्र आपके कर्म, कथन और विचार इन तीन परतों या परिधियों से घिरा है।

स्वयं का अनुसरण करें

क्या आप इस बात के प्रति सचेत हैं कि आप क्या कर रहे हैं? क्या आप इसे चेतना के साथ कर रहे हैं या सिर्फ इसलिये कर रहे हैं क्योंकि कोई दूसरा भी इसे कर रहा है? क्या आप एक भेड़ की तरह दूसरों का अनुसरण करते हैं? आपके लिए जरूरी है कि आप एक मनुष्य बनें ना कि कोई भेड़। भीड़ का अनुसरण ना करें बल्कि अपनी अलग पहचान रखें। केवल तभी आप एक गुरु बन सकते हैं। केवल खुद की पहचान बनाने वाला व्यक्ति ही एक गुरु बन सकता है। भीड़ में आप केवल एक दास हैं क्योंकि वो भीड़ ही गुलामों से बनी है। भीड़ आपको एक गुलाम ही बने रहने देना चाहती है। क्योंकि केवल तभी वो शक्तिशाली हो सकती है। सभी राजनेता और धार्मिक गुरु आपको एक दास की तरह ही देखना चाहते हैं क्योंकि तब ही वो धार्मिक गुरु और नेता महान बने रह सकते हैं।

अगर आप थोड़े सतर्क या जागरूक होते हैं तो आप यह देखने में पूरी तरह समर्थ होंगे कि ये नेता और धर्मिक गुरु झूठे हैं और आपको इनका अनुसरण करने की कोई आवश्यकता नहीं है। उनका अनुसरण करना खाईयों में गिरने के समान है। देखें कि आप क्या कर रहें हैं और क्यों कर रहे हैं। क्या यह करना अर्थपूर्ण या जरूरी है? आप अपने जीवन का कीमती समय जो इसे दे रहे हैं, क्या यह उसके लायक है? या आप इसे सिर्फ इसलिये कर रहे हैं क्योंकि आपको पता नहीं कि और क्या करना चाहिए? बिना कारण जाने कुछ करने से बेहतर है कि आप कुछ ना करें। बिना जानें कुछ ना करें बल्कि सोचें कि क्या करना चाहिए। कई बार आप बिना सोचे कुछ कह जाते हैं और आपको फिर बाद में उस बात के लिए परेशानी उठानी पड़ती है। कई बार आप कोई बेकार की बात कहना नहीं कहने का निर्णय लेते हैं लेकिन बाद में कुछ ना कहना आपके लिए समस्या बन जाती है। अगर आप इस बात पर ध्यान नहीं देते हैं कि आप क्या कर रहे हैं तो दोनों प्रकार की स्थिति आपके लिए समस्याएं पैदा कर सकता है। ऐसे में आपकी स्थिति बिलकुल वैसी होगी जैसे नींद में चलने वाले एक व्यक्ति की होती है। इसलिये जीवन में एहतियात बरतें। आप क्या सोचते हैं और क्या करते हैं, इस चीज में खुद को दक्ष बनाएं। स्वतंत्र रहें। अगर आप ज्ञानी और जागरूक हैं तो स्वतंत्रता आपके जीवन में अपनी स्वेच्छा से आयेगी। आपके जीवन में स्वतंत्रता एक गुरु की छाया की तरह बनी रहेगी।

आप एक साधक हैं

बुद्ध की यह बात याद रखें कि कि आप एक खोजकर्ता या जिज्ञाशु हैं। आप अपना सच्चा घर तलाश रहे हैं लेकिन अब तक यह आपको मिला नहीं है। पिछले कई जन्मों से आप तलाश करते आ रहे हैं और इस जीवन में भी आप तलाश कर रहे हैं। क्या आपने इसे तलाश लिया है? आप अपना समय बर्बाद ना करें। रास्ते से भटके नहीं। अपनी पूरी ऊर्जा तलाश करने में लगाएं क्योंकि कोई नहीं जानता कि कल क्या होगा। जीवन की खुशी केवल इसी बात में है जब कोई किसी चीज के गुरु या ज्ञानी बन जाते हैं और यह खुशी तब असीमित हो जाती है जब कोई व्यक्ति अपनी सोच, अपने कर्म और अपने कथन में पूरी तरह दक्ष या ज्ञानी हो जाता है। बुद्ध कभी भी मन और शरीर को नहीं बांटते हैं। वह कहते हैं: दोनों में ज्ञानी बनें क्योंकि आप मनोदैहिक हैं। इसलिये आप अपने शरीर और मन के गुरु बनें और तभी आप जान पायेंगे कि आप कौन हैं। तभी आप जान पायेंगे कि शरीर और मन से परे आपका अस्तित्व है और आप अपनी शुद्ध चेतना को जान पायेंगे।

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