अलविदा अहंकार

विजय कुमार अहंकार के खिलाफ आपको चेतावनी देते हैं और वह कहते हैं कि- “अपने आप में कम आसक्त हो।”

 

एक प्याज के बारे में सोचिये, अगर आप उसे छीलते हैं, तो आपको एक के बाद एक परत प्राप्त होती है, क्योंकि उसके अंदर कोई गूदा नहीं होता हैं। उस स्थान पर मेरे या किसी और में इस तरह का कोई भी गुण नहीं है। जिस पर हम अपने आप पर गर्व महसूस करते हैं, अर्थात् जिसे हम अहंकार से संबंधित मानते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के पास अपने काम, सफलता, परिवार या प्रसिद्धि से संबंधित अहंकार होता है। अहंकार एक व्यक्ति या दूसरे व्यक्तियों के बीच अंतर पैदा करता है। प्रत्येक व्यक्ति नाम और पहचान के बिना पैदा होता है। वह भूल जाता है कि- वह ईश्वर और ब्राहमण काएक मूल तत्व है।

 

अहंकार के दो मुख्य कारण ज्ञान और धन हैं। “लेकिन कोई भी व्यक्ति यदि ये दोनों तत्व होते हुए भी, आध्यात्मिक व्यवहार जैसे- धार्मिक पूजा, शास्त्रों का अध्ययन, तीर्थयात्राओं मे सम्मिलित होना और मंत्र का जाप या ध्यान करना जैसे कार्य करता है, तो उसमें अहंकार बहुत कम होता है।“ संतों के पास इस अहंकार का केवल एक अंश होता है,क्योंकि वें उनकी “मैं या स्वयं की भावना” से मुक्त हो चुके हैं। और अब  उनके पास केवल ‘आध्यात्मिक भावना या भव या शुद्ध अहम’ है, जोकि उन्हें अपने  आध्यात्मिक अनुभव, कि- ‘मैं आत्मा हूँ’ की एक भावना से प्राप्त हुआ है।

 

हम अपने भौतिक शरीर, भावनाओं और धारणाओं के साथ पहचाने जाते है। जो हमारे अवचेतन मन में विभिन्न विचारों या संस्कारों जैसे- तेज-मिज़ाज़ व्यक्तित्व, इच्छाएं,पसंद और नापसंद के कर्ण होते हैं, जहाँ जीवन का एकमात्र उद्देश्य “सांसारिक खुशी” प्राप्त करना होता है।

 

अहंकार से हानि और क्रोध

 

विचारों और भावनाओं के अनुसार- हमारा अहंकार क्रोध, घृणा, किसी एक के अपने कौशल में विश्वास का नेतृत्व कर सकता है और अभिलाषायें, व्यक्तिगत खुशी को प्राप्त करने के लिए या दूसरों के लिए त्याग की भावना को विकसित करने के लिये लगातार प्रयास कर सकती हैं।

 

यदि आपमें अधिक अहंकार है, तो आपको अत्यधिक दुख और हानि का समाना करना पड़ता है। यदि एक गर्वित खूबसूरत औरत समय के साथ वृद्ध हो जाती है या बीमार हो जाती है और उसकी सुंदरता लगातार फीकी पड़ती जाती है, तो वह दुखी हो जाएगी। और इसी प्रकार अगर कोई अमीर आदमी, अपने धन और सत्ता के प्रति सचेत है और अचानक से वह ये सब खो देता है, तो वह भी इसके लिए दुखी होगा। कभी-कभी अहंकार की वजह से, मनोवैज्ञानिक दुख, शारीरिक कष्ट से भी ज्यादा दर्दनाक होता है।

 

दूसरी ओर, संतों का मानना है कि- “सब कुछ भगवान से संबंध रखता है और वे कुछ भी नहीं है।“ यही कारण है कि- “वे आनंद या परमानंद की स्थिति मे हैं।“ यह श्री दासबोध की बोली है: “यदि आप कहते हैं कि- आप कर्ता हैं, तो आप दुखी हो जायेंगे, लेकिन यदि आप कहते हैं कि- श्री राम कर्ता हैं, तो आप सफलता, प्रसिद्धि और वीरता प्राप्त करते हैं।“

 

‘मैं या स्वयं की भावना’ को नष्ट किए बिना, कोई भी एक सच्चा ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता है। यदि सैद्धांतिक ज्ञान का उपयोग किसी एक को बेहतर बनाने के लिए किया जाए तो, यह बहुत उपयोगी है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो यह ज्ञान अहंकार में बदल जाता है और बौद्धिक पथभ्रष्ट का नेतृत्व करता है।

 

केवल एक अहंकार को समाप्त करके ही, आध्यात्मिक ज्ञान को प्राप्त किया जा सकता है। जब तक एक व्यक्ति में- ‘मैं’, ‘मुझे’, ‘मेरी’ की भावना बानी रहती है, तब तक वह भगवान या ब्राह्मण को नहीं जान सकता है। “लेकिन हम अहंकार को नष्ट करने की प्रक्रिया को कैसे शुरू करते हैं?”

 

जागरुक बनने के साथ आरंभ करें और अपने दोषों को स्वीकार करके आगे बढ़ने की शुरुआत करो। अर्थात दूसरों के दोषों की ओर इशारा करना बंद करें।

 

लोगों के प्रति विनम्रता को अपनाओ और सभी चीजों का भगवान की रचना के रूप मे मान करो। सीखने और सुनने के दृष्टिकोण को विकसित करो। सीखने के कौशल में, कोई भी एक ‘मैं कुछ भी नहीं जनता हूँ’ के प्रति जागरूक हो जाता है और दूसरों को सुनने से, हम अपने धैर्य, प्यार,सम्मान, और सहनशीलता को बढ़ा सकते हैं क्योंकि ये हमारे अहंकार को कम करता है।  जब एक व्यक्ति सम्मान या प्रशंसा की उम्मीद या मांग करता हैं, तो यह केवल उसके अहंकार को बढ़ावा देती है। अपने आप से किसी एक के परिवार या किसी एक की खुशी या दुख के बारे में बात करना उस व्यक्ति के के प्रति लगाव को दर्शाता है। किसी एक के बारे में केवल बात ना करने से ही, उसके प्रति लगाव को अपने आप से ही समाप्त किया जा सकता है। यह उपाय अहंकार को कम करता है। आप देखो कि- “आप स्थितियों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया करतें हैं।”क्या आप बाद में उन पर पछताने की बातें करते हो? इसके बजाय आप प्रतिक्रियाओं को नियंत्रित करना और आत्मविश्लेषण करना सीखें।

 

स्वार्थ भी अहंकार का एक अन्य स्रोत है। या शारीरिक रूप में (मुझे दुख नहीं होना चाहिए), मौखिक रूप में (क्या वे जो मेरे साथ अच्छा व्यवहार करते हैं, जानते हैं कि- मैं कौन हूँ?) या मनोवैज्ञानिक रूप में (मेरी इच्छाओं का पालन किया जाना चाहिए?)। अहंकार को कम करने के लिए, अपने भाषण में- ‘मैं’, मुझे ‘मेरा’ जैसे शब्दों का प्रयोग ना करें। केवाल अपने लिये ही नहीं दूसरों के लिये भी कार्य करें। बच्चों के साथ खेलें जो कि- “आपकी स्थिति को और आपके अहंकार को भूलने मे आपकी मदद करते हैं।“

 

प्रेम, धैर्य, सहिष्णुता 

 

साधना एक ऐसा प्रयास है जो- “प्रतिदिन अहंकार को नष्ट करती है और भगवान का एहसास कराती है।“ भगवान की सेवा या सतसेवा आप सभी के लिए इस भावना के साथ कि- “आप सभी भगवान के सेवक हैं”, के रूप में आप सभी के लिये भगवान के द्वारा दी हुई एक भेंट हैं।“

 

यदि एक व्यक्ति के पास यह आध्यात्मिक भावना है कि- “मेरे द्वारा की हुई सेवा से भगवान प्राप्त हो रहे हैं और मेरे सभी कार्य भगवान द्वारा प्रदान किये गए हैं।” तो वह अपने कार्यों के लिये अर्चना नहीं करेगा। जब नियमित शारीरिक कामकाज जैसे- कपड़े धोने और सफाई करने के कार्यों का सेवा के रूप में प्रदर्शन किया जाता है, तो वहाँ तेजी से अहंकार में कमी आती है, लेकिन नहीं आप इस तथ्य के लिए ऋण चाहते हैं! अपने शरीर, मन और धन का त्याग करो। एक वस्तु को त्यागना, आपकी प्रार्थना में आपकी मदद करता है। मानसिक रूप से भगवान के लिए अपने घर और सामान को अर्पण करें और स्वयं के बारे में एक देखभाल करने वाले के रूप में विचार करें।

 

आध्यात्मिक प्रेम या प्रीत बिना उम्मीद का प्यार है। इसलिए, दूसरों के बारे में भी सोचो, ना कि सिर्फ अपने बारे में। जब स्वयं के लिए प्यार कम हो जाता है, तो अहंकार कम हो जाता है। आध्यात्मिक प्यार पूर्ण रूप से ईश्वर के प्रेम और उनकी कृतियों, जिसमें परिवार बिना किसी उम्मीद के शामिल हैं। भगवान की कृपा से हम अपने अहंकार और अपने खुद के नाम के बारे में भूला जाते हैं। भगवान के नाम का जाप करने के बजाय, उसके नाम के साथ विलय हो जाओ। अहंकार के खिलाफ सचेत रहो और एक आध्यात्मिक भावना को मन में रखो और मुझसे भगवान उनके नाम का जाप करने से प्रभावित हो रहे हैं। दूसरा उपाय अपनी प्रार्थना को बदलना है, अपने आपको उन घटनाओं के प्रति सचेत होने के लिये कहो जो आपमें अहंकार को बढ़ाती है और आपसे उन घटनाओं के लिये अहंकार को कम करने के लिये कहा जाता है।

 

अपने आप से शाश्वत प्रश्न पूछने के लिये कहो कि- ‘मैं कौन हूँ?’जिसका जवाब आपके अंदर ही निहित है। अपने अंदर देखो और तब आप अपने पूरे दिल से कहोगे कि- “मैं कोई नहीं हूँ।”

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